तालाब के पास जनरल असेम्बली कालेज में भर्ती हुआ और एफ.ए. वहीं से पास किया है। उनके असंख्य गुणों के कारण बहुत से सहपाठी उनमें अत्यंत अनुरक्त हैं। वे उनका गाना सुनकर इतना आनन्दप्रद मानते हैं कि अवकाश पाते ही नरेन्द्र के घर पर उपस्थित हो जाते हैं। बैठकरएक बार नरेन्द्र की तर्क-युक्ति या गाना-बजाना आरम्भ होते ही समय कैसे निकल जाता है, वे समझ नहीं पाते।

‘‘नरेन्द्र इस समय अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने जाते हैं और शेष समय समीप की गली में अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते हैं। अध्ययन के लिए ही वह यहां रहे हों ऐसी बात नहीं, नरेन्द्र एकान्त में रहना अधिक पसन्द करते हैं।’’

कमरा बहुत छोटा था। नरेन्द्र ने उसका नाम ‘तंग’ रख लिया था और मित्रों से कहा करते थे, ‘‘चलो, तंग में चलें।’’ अब इस ‘तंग’ की एक बैठक देखिएः


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ही भला लगता। उसने भिक्षुक-गायकों से राधाकृष्ण और सीताराम की लीला संबंधी कितने ही गाने सीख लिए थे। जब वह इन्हें अपने मधुर स्वर में गाता तो सुननेवाले मुग्ध हो उठते। उसे सभी का लाड़-प्यार प्राप्त था। उसपर किसी तरह का कठिन नियंत्रण न था। घर का वातावरण चाहे धार्मिक था, पर किशोर नरेन्द्र की स्वच्छंदता और स्वाधीनता पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था।

नरेन्द्र को रामायण का हनुमान बहुत पसन्द था। उसके अलौकिक कार्याें की कथाएं मन लगाकर सुनता था। फिर मां ने उसे बताया


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