था, ‘‘मैट्रिक परीक्षा के आरम्भ होने के दो-तीन दिन पहले मैंने देखा कि रेखागणित कुछ भी नहीं पढ़ा गया है। तब सारी रात जागकर उसे पढ़ने लगा और 24 घंटे में उसकी चार पुस्तकें पढ़कर परीक्षा दे आया।’ ईश्वर-कृपा से उन्हें दृढ़ शरीर तथा अपूर्व मेघा प्राप्त थी, इसलिए वे ऐसा कर सके थे, इसमें कोई संदेह नहीं।’’ (तृतीय खंड, पृष्ठ 59-60)

मैट्रिक पास करने के बाद नरेन्द्रनाथ जनरल असेम्बली कालेज में भर्ती हुआ और एफ.ए. में पढ़ने लगा। इस समय उसकी उम्र अठारह बरस थी। उसकी तेज बुद्वि और आकर्षक व्यक्तित्व ने अध्यापकों और छात्रों दोनों का ध्यान आकर्षित किया। थोड़े ही समय में बहुत-से विद्यार्थी उसके मित्र बन गए। दरअसल विद्यार्थी उसे अपना मित्र बनाने में गर्व महसूस करते थे। प्रियनाथ सिन्हा नाम के एक मित्र सहपाठी ने इन दिनों के अपने संस्मरण में लिखा हैः

‘‘नरेन्द्रनाथ हेदो


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बेटे को इस स्थिति में देख उन्होंने पूछा, ‘‘अरे, यह क्या कर रहा है, बिले?’’ बेटे ने चट उत्तर दिया, ‘‘मैं यह परीक्षा कर रहा था कि अगर मैं जाति-भेद न मानूं तो मेरा क्या होगा।’’ बाप ने सस्नेह बेटे की ओर देखा और वह मुस्कराते हुए पठन कक्ष में चले गए।

लगातार रामायण और महाभारत सुनते-सुनते नरेन्द्र को उनका बहुत-सा भाग

18 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

कंठस्थ हो गया था। कथा के समय वह कई बार इन्हें अपने बल मधुर स्वर में श्रोताओं को सुनाता तो बहुत


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