25 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
संगीत में नरेन्द्र के मुसलमान उस्ताद ‘बंनी’ और हिंदू उस्ताद कांसी घोषाल थे। कांसी घोषाल आदि ब्रह्मसमाज की संगीत-साधना में पखावज बजाया करते थे। नरेन्द्र ने पखावज और तबला इन्हीं से सीखी। साहित्य इतिहास और दर्शन पारिवारिक परम्परा थी। इस विषय में उसके गुरू भाई स्वामी सारदानन्द ने अपनी पुस्तक ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’ में लिखा है:
‘‘बड़े होने पर परीक्षा के दो-तीन मास पहले वे अपनी पाठ्य-पुस्तकों को पढ़ना आरम्भ करते थे, अन्य समय अपनी इच्छा के अनुसार दूसरी पुस्तकें पढ़कर समय बिताते थे। इस प्रकार मैट्रिक परीक्षा देने के पहले उन्होंने अंगे्रजी और बंगला के अनेक साहित्यिक तथा ऐतिहासिक गं्रथ पढ़ डाले थे। फलतः परीक्षा के पूर्व उन्हें कभी-कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता था। हमें स्मरण है, एक दिन उन्होंने इस विषय का प्रसंग उठने पर हमें बताया
अनेक जातियों के मुवक्किल मकदमों के सिलसिले में ‘दत्त भवन’ आते रहते थे। रिवाज के अनुसार बैठक-घर के एक कोने में उनके लिए चांदी-जड़ाऊ अलग-अलग हुक्के रखे रहते थे। एक दिन उक्त विचार मन में लिए नरेन्द्र बैठक-घर में गया। वहां कोई दूसरा नहीं था। नरेन्द्र ने एक-एक हुक्के को अपने होंठों से लगाकर गुड़गुड़ाया। यह देख उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि वह जैसा पहले था, वैसा ही बना रहा। उसमें कोई परिवर्तन तो हुआ नहीं। एकाएक विश्वनाथ बाबू उधर आ निकले और