के सिद्वांत की व्याख्या यों की थी: ‘‘विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है। ज्यों ही कोई विज्ञान पूर्ण एकता तक पहुंच जाएगा, त्योंही उसकी प्रगति रूक जाएगी, क्योंकि तब वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। उदाहरणार्थ, रसायन शास्त्र यदि एक बार उस मूल तत्व का पता लगा ले, जिससे और सब द्रव्य बन सकते हैं, तो वह फिर और आगे नहीं बढ़ सकेगा। भौतिकी जब उस एक मूल शक्ति का पता लगा लेगी, अन्य शक्तियां जिसकी अभिव्यक्ति हैं, तब वह वहीं रूक जाएगी। वैसे ही, धर्मशास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, जब वह उसको खोज लेगा, जो इस मृत्यु के इस लोक में एकमात्र जीवन है, अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां है। इस प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’
विवेकानन्द
की चरम सीमा कहा था, इसलिए जर्मन वामपंथियों ने उन्हें सरकारी चिंतक बताया और उनके समूचे दर्शन
को रद्द कर दिया। लेकिन माक्र्स ने इस भूल को सुधारा माक्र्स ने कहा कि छिलके के साथ गूदा मत फेंको। हेगल का दर्शन सिर के बल खड़ा है, उसे टांगों के बल खड़ा करने की जरूरत है। मतलब यह कि समाज विचार का प्रतिबिम्ब नहीं, बल्कि विचार समाज का प्रतिबिम्ब है। जैसे-जैसे मनुष्य ने प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में आर्थिक और भौतिक उन्नति की है, वैसे-वैसे समाज और उसकी विभिन्न