वह हवाखोरी कि लिए जाया करता था। विश्वविख्यात लेखक रोमां रोला ने अपनी पुस्तक ‘विवेकानन्द’ में लिखा हैः
‘‘नरेन्द्र का शैशव और बाल्यकाल यूरोपीय पुनर्जागरण काल के कलाप्रेमी राजकुुमार का-सा रहा। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी और सभी दिशाओं में उन्होंने उसका विकास किया। उनका रूप सिंह शावक का सा प्रभावशाली और मृग छौने-सा कोमल था। बलिष्ठ सुगठित शरीर कसरतों से और भी मंज गया था-कुश्ती, घोड़े की सवारी, तैरने और नाव खेने का उन्हें शौक था। युवकों के वे नेता और फैशन के नियंता थे। नृत्योंत्सवों में वे कलापूर्ण नृत्य करते थे और उनका कंठ बड़ा सुरीला था, जिसपर अनन्तर रामकृष्ण भी मुग्ध हुए। उन्होंने चार-पांच वर्ष तक हिंदू और मुसलमान संगीताचार्यों के साथ गायन और संगीत का अभ्यास किया। वह स्वयं गीत लिखते भी थे और उन्होंने भारतीय संगीत के दर्शन और विज्ञान पर एक संदर्भ ग्रंथ भी प्रकाशित किया...’’ (पृष्ट 36)
नजदीक नरेन्द्र का मुसलमान के हाथ से खाना कोई अपराध नहीं था। पर परिवार के दूसरे लोगों इस पर बड़ी आपत्िा थी। वे नरेन्द्र को तरह-तरह के भय दिखाकर दूसरी जाति के हाथ का खाने से मना करते थे।
पर यह बात नरेन्द्र के मन में न बैठती। जाति-भेद उसके लिए एक पहेली बन गया। वह सोचता-एक व्यक्ति किसी दूसरे के हाथ का क्यों नहीं खाता? अगर कोई दूसरी जात-बिरादरी के हाथ का खा ले, तो उसका क्या होगा? क्या उसके सिर पर छत टूट पड़ेगी? क्या वह मर जाएगा?