नरेन्द्र शरीर से हष्ट-पुष्ट था और सोलह बरस की आयु में बीस बरस का जान पड़ता था। कारण यह कि वह नियमित रूप से व्यायाम किया करता था। बचपन ही से वह कुश्ती का अभ्यास करता आ रहा था। यह राजनैतिक चेतना का युग था। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी और आनन्दमोहन बसु ने विद्यार्थी संघ की स्थापना की थी और वे नौजवानों को शारीरिक और मानसिक रूप से सबल होने की शिक्षा देते थे। शिमला मोहल्ला में कार्नवालिस स्ट्रीट के पास एक अखाड़ा था। हिंदू मेले के प्रवर्तक नवगोपाल मित्र ने उसकी स्थापना की थी। नरेन्द्रनाथ अपने मित्रों के साथ वहीं व्यायाम का अभ्यास किया करता। बाॅक्सिंग (मुुक्केबाजी) में वह एक बार सर्वप्रथम आया और उसे चांदी की तितली पुरस्कार में मिली। अपने समय में वह क्रिकेट का भी अच्छा खिलाड़ी था। उसे घोड़े की सवारी का शौक था। पिता ने उसके लिए एक अच्छा-सा घोड़ा खरीद दिया था, जिसपर सवार होकर
मैं तुम्हें अपने साथ ज़रूर ले जाऊंगा।’’ नरेन्द्र कभी-कभी अगले ही दिन पंजों के बल खड़ा होकर कहता, ‘‘देखिए, मैं रता भर में दो अंगुली बड़ा हो गया हूं। अब आप मुझे अपने साथ ले चलिए।’’ मैं रात भर में दो अंगुली बड़ा हो गया हूं। अब आप मुझे अपने साथ ले चलिए।’’ इस पठान मुवक्किल से नरेन्द्र का अनुराग इतना बढ़ गया कि वह उसके हाथ से संदेश या फल लेकर निस्संकोच खा लेता था। विश्वनाथ कट्टर नहीं थे, उनकी दृष्टि में सभी जाति के लोग समान थे। इसलिए उनके