में भी निपुण थे। नरेन्द्र ने उनसे तरह-तरह के भोजन बनाने सीखें कालेज में वे अपने मित्रों को समय-समय पर अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाया करते थे। फिर जब वे स्वामी विवेकानन्द बनकर विश्व-भ्रमण पर गए तो विदेशियों को भारतीय खानों का स्वाद चखाया करते थे। अमेरिका में ‘सहÛद्वीप उद्यान’ में दो महीने के सहवास में वह अपने शिष्यों को प्रायः अपने हाथ से विभिन्न भारतीय व्यंजन तैयार करके खिलाते थे।
दो बरस के बाद जब नरेन्द्रनाथ रायपुर से लौटा तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत बदल चुका था। मित्र उसे अपने बीच पाकर बहुत प्रसन्न हुए। वह स्कूल में दाखिल हुआ और नवीं और दसवीं कक्षा की तैयारी एक साल में की। लेकिन स्कूल में सिर्फ वही एक विद्यार्थी था, जिसने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। इससे न सिर्फ सगे संबंधियों बल्कि स्कूल के अधिकारियों को भी बड़ी खुशी हुई।
नहीं लगती? मां इन प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर न दे पाती तो नरेन्द्र उद्दंड हो उठता और नियमांे का उल्लंघन करता।
विश्वनाथ के मुवक्किलों में एक पठान भी था। नरेन्द्र के प्रति उसका विशेष स्नेह था। उके अपने की खबर सुनते ही नरेन्द्र दौड़ा जाता और उसकी गोद में बैठकर पंजाब और अफगानिस्तान के हाथियों और ऊंटों की कहानियां बड़े चाव से सुनता। कई बार वह उसके साथ जाने का अनुरोध करता था। वह मुसलमान सज्जन हंसते हुए कहता, ‘‘तुम दो अंगुल और बड़े हो जाओ, तब