शब्द कह दिए। विश्वनाथ ने इसके लिए बेटे को कुछ नहीं कहा, पर जब नरेन्द्र अपने सहपाठियों के साथ अपने पढ़ने के कमरे में गया तो कोयले से दीवार कर यह लिखा मिलाः ‘‘नरेन्द्र बाबू ने अपनी माता के प्रति आज इन दुर्वचनों का प्रयोग किया है।’’ नरेन्द्र की गर्दन लज्जा से झुक गई और वह इस शिक्षा को उम्र भर नहीं भूल पाया।

अगर कोई व्यक्ति नरेन्द्र की युक्तिपूर्ण बातों को बच्चे की धृष्टता समझकर उपेक्षा करता तो वह क्रोध के मारे आपे से बाहर हो जाता। उस समय उसे छोटे-बड़े का भी ध्यान न रहता। कई बार वह अपने पिता के मित्रों तक को खरी-खरी सुना देता। विश्वनाथ इस उद्दंडता के लिए बेटे को क्षमा नहीं करते थे। वे नरेन्द्र को दंड देकर आगे के लिए सावधान कर देते थे। पर बेटे की आत्मनिष्ठा को देखते हुए मन ही मन में वे प्रसन्न भी होते थे।

24 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

विश्वनाथ पाकविद्या


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लगा लेता। बहनें अपवित्र होने के डर से उसे छू न पाती। वह विजय-गर्व

17 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

से ताली बजाकर कहता, ‘‘लो, पकड़ो न मुझे!’’

घर में जाने कब से चले आ रहे देशाचर और लोकाचार के नियमों को नरेन्द्र बचपन ही से नहीं मानता था। इसके लिए मां अगर झुंझलाती या डांटती-डपटती, तो वह निरीह भाव से पूछता-भात की थाली छूकर बदन पर हाथ लगाने से क्या होता है? बायें हाथ से गिलास उठाकर जल पीने से हाथ क्यों धोना पड़ता है? हाथ में तो जूठन


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