और अब यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि उन लेखक महोदय की भविष्यवाणी सही सिद्व हुई।
नरेन्द्र रायपुर में दो बरस तक रहा। इस बीच में उसने पुस्तकों और वाद-विवाद द्वारा जो कुछ सीखा वह तो सीखा ही, पर इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि उसके किशोर मन पर पिता के व्यक्तित्व की गम्भीर छाप पड़ी। एक दिन नरेन्द्र ने जाने कैसे पिता से पूछा, ‘‘पिताजी, आप हमारे लिए क्या छोड़ रहे हैं?’’ विश्वनाथ ने दीवार पर लगे आइने की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया, ‘‘जा, आइने में अपना चेहरा देख, तभी समझेगा कि मैंने तुझे क्या दिया है।’’
विश्वनाथ बेटों को सामंती ढंग से कभी डांटते-डपटते या बुरा-भला नहीं कहते थे, बल्कि उन्हें सुधारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का उनका अपना ही ढंग था। अपने उद्दंड स्वभाव के कारण नरेन्द्र ने एक दिन मां को कुछ कटु
की पूजा न भी करो तो कोई हानि नहीं। कल से शिव की पूजा करना, बेटा!’’
मां जब किसी काम में व्यस्त हो गई तो नरेन्द्र दबे पांव ऊपर गया। सीताराम की मूर्ति, जो उसने इतने चाव और श्रद्वा से खरीदी थी, कमरे से उठा लाया। मुंडेर पर आकर उसने मूर्ति बिना संकोच नीचे फेंक दी, जो गिरते ही चूर-चूर हो गई।
नरेन्द्र बड़ा नटखट था। उसके ऊधम के मारे सबकी नाक में दम था। बड़ी बहनें उसके पीछे दौड़ती कि पकड़कर पीटें। नरेन्द्र चट से नाली में उतरकर बदन पर कीचड़