उस समय प्रायः नरेन्द्र भी वहीं उपस्थित होता और वाद-विवाद ध्यान से सुना करता था। कभी-कभी विश्वनाथ नरेन्द्र से भी किसी विषय पर उसकी राय पूछ लेते और यों उसे विवाद में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते थे। नरेन्द्र उम्र में चाहे छोटा था, पर उसके विचार इतने साफ-सुथरे और सुलझे हुए थे कि सुनकर बड़े-बूढे़ भी आनन्द से झूम उठते थे।
विश्वनाथ के मित्रों में एक सज्जन बंग-साहित्य के प्रसिद्व लेखक थे। एक दिन जब वे साहित्य पर वाद-विवाद कर रहे थे तो उसमें भाग लेने के लिए नरेन्द्र को भी बुला लिया गया। बस, अब क्या था, नरेन्द्र ने थोड़े ही समय में यह सिद्व कर दिखाया कि उसने अधिकांश लेखकों की पुस्तकें न सिर्फ पढ़ ली हैं, बल्कि उनके बहुत-से अंश उसे कंठस्थ हैं और वह उनकी तर्कसंगत आलोचना भी कर सकता है। उन लेखक महोदय ने विस्मय और आनन्द में भरकर कहा, ‘‘बेटा! आशा है, एक दिन बंग भाषा तुम्हारे द्वारा गौरवान्वित होगी।’’
होता। नरेन्द्र के मन में कोई समस्या, कोई प्रश्न उठता तो कोचवान मित्र ही उसका उत्तर दिया करता था। एक दिन अचानक ब्याह पर चर्चा चली। कोचवान को जाने क्यों ब्याह पसन्द नहीं था। उसने ब्याह का ऐसा भयानक चित्र खींचा कि नरेन्द्र बेचैन हो उठा और रोता हुआ मां के पास आया। मां ने बेटे से रोने का कारण पूछा तो उसने कोचवान की बात सुनाकर कहा, ‘‘मां, मैं सीताराम की पूजा कैसे करूं? सीता तो राम की पत्नी थी।’’ मां ने उसे गोद में बैठाकर आंसु पोंछे और बड़े दुलार से कहा, ‘‘सीताराम