यह वह अवस्था थी, जब चरित्र का निर्माण होता है। नरेन्द्र के चरित्र का वास्तविक निर्माण भी रायपुर में हुआ। उस समय वहां कोई स्कूल नहीं था इसलिए विश्वनाथ बेटे को खुद ही घर पर पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां न तो अदालत जाना होता था और न मुवक्किलों से माथा-पच्ची करनी पड़ती थी। फुरसत ही फुरसत थी। पाठ्य-पुस्तकों के अलावा वे नरेन्द्र को इतिहास, दर्शन और साहित्य संबंधी विभिन्न पुस्तकें पढ़ाने लगे। बेटे की ग्राह्म-शक्ति देखकर विश्वनाथ दंग रह गए और उन्हें पढ़ाने में आनन्द भी आने लगा। उन्होंने बड़े परिश्रम से जितना ज्ञान अब तक अर्जित किया था। वह अपने इस सुयोग्य पुत्र को सौंप दिया।

उनके घर में हर रोज़ रायपुर के गुण-ज्ञानी व्यक्तियों का जगघट होता था।

23 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

साहित्य, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा चलती थी। घंटों वाद-विवाद होता और सूक्ष्म विवेचन किया जाता था।


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मन पर गम्भीर प्रभाव पड़ता, इनके पात्र उसकी कल्पना में सजीव हो उठते और वह घंटों मंत्रमुग्ध-सा बैठा सुना करता।

रामायण सुनते-सुनते नरेन्द्र को सीता और राम से इतनी श्रद्वा हो गई कि वह एक दिन बाज़ार से उन दोनों की मूर्ति खरीद लाया। मकान की छत पर एक सूने कमरे में उसने यह मूर्ति स्थापित कर दी और वह उसके सामने घंटों ध्यान-मग्न बैठा रहता। अपने एक कोचबान से नरेन्द्र बहत हिल-मिल गया था। बालक को सीताराम से यह प्रेम देखकर वह कोचवान बहुत प्रसन्न


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