रायपुर मध्यप्रदेश का एक नगर है। उस समय सारे मध्यप्रदेश में रेलगाड़ी नहीं थी। इलाहाबाद और जबलपुर होते हुए कलकत्ता से नागपुर तक गाड़ी आती थी। नागपुर से रायपुर जाने में दो सप्ताह से अधिक लगते थे और हिंसक जन्तुओं वाले घने जंगल में से बैलगाड़ी द्वारा जाना पड़ता था। बाद में इस यात्रा का उल्लेख करते हुए नरेन्द्रनाथ ने लिखा है, ‘‘वनस्थली का सौंदर्य देखकर मुझे रास्ते के कष्ट, कष्ट ही मालूम नहीं हुए। विंध्य पर्वत की आकाश को चुमती हुई चोटियां, फूलों और फलों से लदी हुई तरह-तरह की बेलें, कंुज-कुंज में चहचहाते हुए रंग-बिरंगें पक्षी, जो कभी-कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर जाते थे। नरेन्द्र ने यह सब कुछ पहले-पहल देखा था। देश के अतीत की कहानियां उसके मन पर पहले ही से अंकित थी, अब उसका रूप, उसका वैभव, विशालता और महानता भी अंकित हो गई। देश को और अधिक देखने की इच्छा भी यहीं से पैदा हुई।
पति तथा पुत्रों से चर्चा चलाकर तत्कालीन हलचलों और आधुनिक विचारधारा से भी अवगत रहती थी। नरेन्द्र को मां के मुख से रामायण और महाभारत की कहानियां बड़े चाव से सुनाया करती थी। दत्त भवन में प्रायः प्रतिदिन दोपहर को रामायण और महाभारत की कथा होती थी। कोई बुढ़िया अथवा खुद भुवनेश्वरी देवी पढ़ती और मुहल्ले की दूसरी औरतें सुनती। नरेन्द्र वैसे चंचल स्वभाव का बालक था, लेकिन इस छोटी-सी महिला सभा में वह चुपचाप और शान्त बैठा रहता था। इन ग्रन्थों की कहानियांे का उसके