महेन्द्र और भूपेन्द्र उसके छोटे भाई भी हर तरह चुस्त-दुरूस्त थे। पर नरेन्द्र से उनका कोई मुकाबला न था। वह जब नरेन्द्र से स्वामी विवेकानन्द बन गया तो बाल्यकाल के बारे में उसने एक शिष्य से बातें करते हुए कहा,‘‘मैं बचपन ही से जिद्दी शैतान था। नहीं तो क्या खाली हाथ सारी दुनिया घूम आना संभव था।’’
शिक्षा
‘‘चूंकि हम लोगों ने अपना आधा जीवन विश्वविद्यालयों में बिता दिया है, अतः हमारा मन दूसरों के विचारों से भर गया है।’’
-विवेकानन्द
नरेन्द्रनाथ जब चैदह बरस का था तो उसे पेट का भयंकर रोग हुुआ। यह रोग कई दिन तक रहा और इससे शरीर सूखकर कांटा हो गया। उस समय उसके पिता अपने काम से रायपुर में थे और उन्हें वहां अभी काफी दिन रहना था। इस ख्याल से कि हवा बदलने से स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा, उन्होंने परिवार के लोगों को भी रायपुर बुला लिया। 1877 में नरेन्द्र अपने पिता के पास रायपुर पहुंचे।
था। वे खुले हाथ से खर्च करते और खुले हाथ से दान भी देते थे। बचाकर रखने की, भविष्य अथवा परलोक की चिंता उन्हें नहीं थी। एक वाक्य में यों कह लीजिए कि वे भोग और त्याग का ‘आधुनिक समिश्रण’ थे-उदार, स्वच्छंद और मिलनसार!
ठसके विपरीत भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थी। नरेन्द्र के बाद दो छोटे भाई और दो बहनें और थी। मां बेटे-बेटियों की स्नेह-पूर्वक देख-भाल करती थी। रामायण, महाभारत, भागवत आदि पुराणों का पाठ वे नियमित रूप से किया करती थी। और