लेता है।’’ बूढे़ ने ब्रह्मराक्षस की विकट आकृति का वर्णन किया और क्रूरता के दो-चार उदाहरण देकर समझाया कि वह अपने आश्रित पेड़ का अपमान कभी सहन नहीं करेगा। नरेन्द्र को चुप देखकर

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बूढे़ ने समझा कि सीख काम कर गई। पर जैसे ही बूढ़ा वहां से हटा नरेन्द्र फिर उसी ऊंची चोटी पर चढ़ बैठा। लेकिन उसके साथी की हिम्मत नहीं पड़ी। वह भयभीत-सा नीचे खड़ा रहा। ‘‘आओ न ऊपर’’ नरेन्द्र ने उससे कहा। ‘‘नहीं भाई, ब्रह्मराक्षस की बात कौन जाने? न मालूम कब किधर से आकर गर्दन मरोड़ डाले’’। साथी ने उत्तर दिया। ‘‘धत्! तू भी निपट मूर्ख है।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘तेरे दादा डराने के लिए झूठ-मूठ बात बना गए। अगर पेड़ पर सचमुच ब्रह्मराक्षस रहता तो उसने मेरी गर्दन कब की मरोड़ दी होती।’’

नरेन्द्र का यही स्वभाव सारी उम्र बना रहा। किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले वह उसे तर्क की कसौटी पर कसता था।


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बाइबिल पढ़कर उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली थी। लेकिन इस जानकारी का तात्पर्य सिर्फ इतना ही था कि वह उन्हें एक व्यवहारकुशल तथा सफल वकील बनाने में उपयोगी सिद्व हुई। उन्होंने जिस आदर्श का आजीवन पालन किया, वह धड़ल्ले से कमाना और अधिकाधिक सुख-सुविधांए जुटाना। घर पर अतिथियों तथा सगे-संबंधियों की भीड़ लगी रहती थी। ज़रूरत से ज्यादा नौकर-चाकर और

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गाड़ी-घोड़े रखकर ठाठ-बाट से जीना, उनका स्वभाव बन चुका


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