विभिन्न संस्थाओं का विकास हुआ है और उसके साथ ही विचार का भी विकास हुआ है। यों माक्र्स ने हेगल के द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में बदल दिया, यानी उसे पांव के बल सीधा खड़ा कर दिया।
अब देखिए, विवेकानन्द कहते हैं: ‘‘मेरे मत में बाह्म जगत् की एक सत्ता-हमारे मन के विचार के बाहर भी उसका एक अस्तित्व है। चैतन्य के क्रमविकास रूपी महान विधान का अनुवर्ती होकर यह सम्रग विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। चैतन्य का यह क्रमविकास जड़ के क्रमविकास जड़ के क्रमविकास से पृथक है। जड़ का क्रमविकास चैतन्य की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीत-स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में बद्व रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व नहीं प्राप्त कर सके।’’
और शिकागो धर्म-महासभा में भाषण देते हुए विवेकानन्द ने अपने इस क्रमविकास
हेगल ने जर्मन आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक सिद्वांत द्वारा भौतिकवाद के कगार तक पहुंचा दिया था। हेगल की मान्यता थी कि समाज विचार का प्रतिबिम्ब मात्र है और चूंकि विचार का निरन्तर विकास हो रहा है, यह विकास तब तक होता रहेगा जब तक वह अपनी चरम सीमा को नहीं पहुंच जाता। और हेगल की दृष्टि में जर्मन की तत्कालीन प्रूश्यिन सरकार विकास की चरम सीमा थी, इसलिए उसके आगे विकसित होने अथवा बदलने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।
हेगल ने चूंकि सामती, पू्रश्यिन सरकार को विकास