नरेन्द्र को भय दिखाकर किसी काम से रोकना संभव नहीं था। इस सिलसिले की एक घटना इस प्रकार है।

उसके एक पड़ोसी साथी के घर में चम्पक फूल का एक पेड़ था। पेड़ की टहनी में पैर की गोंफ डालकर सिर और हाथ नीचे लटकाकर झूलना नरेन्द्र का प्रिय खेल था। एक दिन वह पेड़ की ऊंची टहनी पर इसी प्रकार झूल रहा था कि उसके एक साथी का दादा उधर आ निकला। बूढ़े का हृदय भय से कांप गया। एक तो ऊंचाई दूसरे नरेन्द्र के उत्पात से टहनी टूटने की काफी आशंका थी। बूढ़ा यह भी जानता था कि नरेन्द्र डराने-धमकाने से मानने वाला नहीं। इसलिए उसने दुलार से कहा, ‘‘बेटा, इस पेड़ पर न चढ़! इस पर तो ब्रह्मराक्षस रहते हैं।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘कहां हैं ब्रह्मराक्षस! ळमने तो देखा नहीं’’। बूढे़ ने फिर कहा, ‘‘ब्रह्मराक्षस दिखाई थोड़े ही देता है। वह तो बिना दिखाई एि ही गर्दन झपट


39 of 675



नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ इस तीसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। धार्मिक कट्टरता का उनमें लेशमात्र न था। अंगे्रजी साहित्य और इतिहास आदि के अध्ययन के अलावा उन्होंने फारसी सीखी थी। हाफिज़ की कविताएं उन्हें विशेष रूप से पसन्द थी। ऊंचे खानदानों के कई मुसलमान मुवक्किल थे। और फिर लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली, लाहौर इत्यादि शहरों की यात्रा के कारण वे अनेक शरीफ मुसलमान परिवारों के घनिष्ठ सम्पर्क में आ चुके थे। यों वे मुसलमानों के रीति-रिवाजों से भली-भांति परिचित थे और उनका सम्मान करते थे।


39 of 1117