किनारे पर पहुंचकर नरेन्द्र अपने साथियों की रक्षा का उपाय सोचने लगा। उसने देखा कि दो गोरे सिपाही मैदान के रास्ते से टहलने जा रहे हैं। वह दौड़कर उनके पास आया और नमस्ते करके एक का हाथ पकड़ लिया। अंगे्रजी तो जानता न था, नरेन्द्र ने उन्हें इशारों से अपनी बात समझायी और घाट की तरफ चलने के लिए खींचने लगा। एक छोटे-से सुन्दर बालक के इस आग्रह से सिपाही बहुत खुश हुए। वे तुरन्त नाव के पास आए और सारी बात समझ गए उन्होंने हाथ का बंेत उठाकर मल्लाहों को डांटा और बच्चों को छोड़ देने का आदेश दिया। गोरे सिपाहियों को देखकर मल्लाह लोग डरे और अपनी-अपनी नावों में चले गए। यों नरेन्द्र के साथियों ने संकट से छुटकारा पाया। दोनों सिपाही नरेन्द्र के इस आचरण से बहुत प्रसन्न हुए। वह उसे अपने साथ थियेटर ले जाना चाहते थे। पर वह अपने हमजोलियों के साथ लौट आया।


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स्वभाव और संस्कार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक को चुनते थे। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी दिन-दिन बढ़ती जा रही थी, जिनका न आदि ब्रह्मसमाज से कोई सरोकार था और न अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज से। और अगर था तो वह भी अत्यन्त औपचारिक और ऊपरी । उन्हें न प्राचीनता से कुछ लेना-देना था और न अपने को आधुनिक दिखाने की विशेष चिन्ता थी। व्यक्तिगत सुख-साधन उनके जीवन का एकमात्र आधार और शिक्षा तथा ज्ञान-चर्चा धन और यश अर्जित करने का साधन मात्र थे। वे अतीत और भविष्य की सरदर्दी मोल न लेकर निश्चित भाव से क्षण में जीते थे।


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