बालक को सुरक्षित देखकर लोग बड़े खुश हुए और सभी ने नरेन्द्र के साहस
20 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की दाद दी।
नरेन्द्र के अपूर्व साहस की एक घटना और है।
कलकत्ता के दक्षिण मटिया बुर्ज में लखनऊ के भूतपूर्व नवाब वाजिद़ अली शाह की पशुशाला थी। नरेन्द्र की उम्र कोई सात-आठ बरस होगी कि वह अपने हमजोलियों के साथ एक दिन यह पशुशाला देखने गया। लड़कों ने आपस में चन्दा करके चांदपाल घाट से एक छोटी-सी नाव किराये पर ले ली। लौटते समय एक बच्चे ने नाव में उलटी कर दी। मुसलमान मल्लाह बहुत भिन्नाया और कहा, ‘‘नाव साफ किए बिना किसी को उतरने नहीं दूंगा।’’ किसी दूसरे आदमी से साफ करा लेने के लिए लड़कों ने पैसे देना चाहे। पर वह नहीं माना और घाट के दूसरे मल्लाहों को इकट्ठा करके उन्हें मारने पर उतारू हो गया। झगड़ा बढ़ते देखा तो नरेन्द्र नाव से उतर गया। वह चूंकि सबसे छोटा था इस लिए मल्लाहों ने उसे नहीं रोका।
पर यह भय स्पष्ट मंडरा रहा था कि कहीं प्राच्य पाश्चात्य से पराजित न हो जाए। ब्रह्मसमाज, जो वास्तव में इस संघर्ष का संगठित रूप था, अब इस भय के कारण आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज-दो में विभाजित हो गया था। इन दोनों के आपसी संघर्ष का परिणाम यह था कि आदि ब्रह्मसमाज वाले प्राचीनता के खोल में सिकुड़ते जा रहे थे और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज वाले परम्परा से संबंध-विच्छेद करके आधुनिकता के नशे में लड़खड़ाते पाश्चात्य की ओर झुक रहे थे। पढ़े-लिखे बंगाली युवक अपने