भाव से बीच में खड़ा होकर उन्हें रोक देता। शारीरिक बल में नरेन्द्र अपने किसी भी हमजोली से हेठा न था, बल्कि उसका असीम साहस देख बड़े भी दंग रह जाते थे। घूंसा-घूंसी में निपुण होने के कारण दुष्ट लड़के उससे दबते थे।
जब उसकी अवस्था केवल छह बरस थी, वह अपने हमजोलियों के साथ ‘चड़क’ का मेला देखने गया। मेला देखा और मिट्टी की बनी हुई शिव की मूर्तियां खरीदी। शाम को जब वे घर लौट रहे थे तो एक छोटा-सा लड़का दल से अलग हो गया और फुटपाथ से रास्ते में चला गया। ठीक उसी समय समाने से एक घोड़ागाड़ी आई, जिसे देख बालक घबरा गया। राह चलते राही रूक गए और ‘बचाओ ! बचाओ! चिल्लाने लगे। शोरगुल सुनकर नरेन्द्र ने पीछे की ओर देखा और सारी स्थिति भांप ली। एक क्षण की भी देर नहीं लगाई। महादेव की मूर्तियां फेंककर वह तेजी़ से लपका। बालक घोड़े के पैरों तले रौंदा ही जानेवाला था कि नरेन्द्र ने उसे बाल-बाल बचा लिया।
था। राजामोहन राय क्या चाहते थे और मैकाॅलेक की शिक्षा प्रणाली ने हमें क्या दिया, इस पर हम आगे चलकर ‘पुनर्जागरण’ परिच्छेद में विचार करेंगे।। यहां सिर्फ
इतना कह देना काफी है कि राजा राममोहन राय प्राचीनता और आधुनिकता में समन्वय और सांमजस्य की जिस स्वस्थ भावना को लेकर चले थे, वह उपेक्षित और विकृत होती जा रही थी। धर्मांधता और रूढ़िवाद के स्थान पर भूगोल, इतिहास, साहित्य, गणित तथा विज्ञान की शिक्षा संकीर्णता तथा छिछले विद्याअभिमान को जन्म दे रही थी। चिंतन के क्षितिज