19 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

यहां तक कि सगत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व प्राप्ति के प्रति उपेक्षा। केवल रघुनाथ के उपदेश का पालन ही जीवन का एकमात्र व्रत। उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिए। ढोल, मृदंग, करताल बजाकर उछल-कूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है। एक तो यह पेट के रोगी मरीजों का दल और उस पर इतनी उछल-कूद! भला कैसे सहन होगी? कामविहीन उच्च साधना का अनुसरण न करके देश घोर तमोगुण से भर गया है। देश-देश में, गांव-गांव में-जहां भी जाओगे, देखोगे, ढोल-करताल ही बज रहे हैं। दुन्दुभी-नगाड़े क्या देश में तैयार नहीं होते? तरही-भेरी क्या भारत में नहीं मिलती? वही सब गुरू-गम्भीर ध्वनि लड़कों को सुना। बचपन से जनाने बाजे सुन-सुनकर, कीर्तन सुन-सुनकर, देश स्त्रियों का देश बन गया है। इससे अधिक और क्या अधःपतन होगा, नगाड़े में ब्रह्मरूद्र ताल का दुन्दुभिनाद


34 of 675

सहारा रह गया। संन्यासी प्रथा के अनुसार बारह बरस बाद जब दुर्गाचरण अपनी जन्मभूमि का दर्शन करने आए तो पत्नी का एक साल पहले देहान्त हो चुका था। उन्होंने अपने बालक पुत्र विश्वनाथ को आशीर्वाद दिया और चले गए। इसके बाद उन्होंने अपने बालक पुत्र विश्वनाथ को आर्शीवाद दिया और चले गए। इसके बाद उन्होंने फिर कभी घर में कदम नहीं रखा और न किसी ने उन्हें देखा।

यह विश्वनाथ ही नरेन्द्रनाथ के पिता थे। उन्होंने भी वकालत का पैत्रिक धंधा अपनाया था। लेकिन वकालत में व्यस्त


34 of 1117