नरेन्द्र ने इसके बाद भी हनुमान को बगीचे में ढूंढ़ा हो या न ढूंढ़ा हो, पर यह तय है कि वह हमेशा उनके प्रियपात्र बने रहे। जैसे-जैसे आयु बढ़ी, उनके प्रति श्रद्वा भी बढ़ती गई। मृत्यु से कुछ महीने पहले शिष्य शरच्चन्द्र चक्रवर्ती ने जब पूछा, ‘‘हमारे लिए इस समय किस आदर्श को ग्रहण करना उचित है?’’ तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘महावीर के चरित्र को ही तुम्हें इस समय आदर्श मानना पड़ेगा। देखो, न, वे राम की आज्ञा से समुद्र लांघकर चले गए! जीवन-मृत्यु की परवाह कहां? महाजितेन्द्रिय, महाबुद्विमान, दास्य-भाव के उस महान आदर्श से तुम्हें अपना जीवन गठित करना होगा। वैसा करने पर दूसरे भावों का विकास स्वयं ही हो जाएगा...अवलम्बन करने योग्य और दूसरा पथ नहीं। एक ओर हनुमान जी जैसा सेवा भाव और दूसरी ओर उसी प्रकार त्रैलोक्य को भयभीत कर देने वाला सिंह जैसा विक्रम!....राम की सेवा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों के प्रति उपेक्षा,
अंग्रेजी भी सीखी थी और वे छोटी ही उम्र में वकालत के धंधे में पड़ गए थे। पर उनका स्वभाव पिता से भिन्न था, धन कमाने में उनकी अधिक रूचि नहीं थी। धर्मानुरागी युवक दुर्गाचरण सत्संग और शास्त्र-चर्चा के अवसर और सुयोग खोजते रहते थे। परिणाम यह कि जब उनकी अवस्था सिर्फ पच्चीस बरस थी तो उत्तर-पश्चिम प्रदेशों से आए वेदान्ती साधुओं से वे इतने प्रभावित हुए कि घर-बार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। पतिवियोग में तड़पती हुई जवान पत्नी के लिए गोद का नन्हा बालक ही एकमात्र