का कठिन नियंत्रण न था। घर का वातावरण चाहे धार्मिक था, पर किशोर नरेन्द्र की स्वच्छंदता और स्वाधीनता पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था।
नरेन्द्र को रामायण का हनुमान बहुत पसन्द था। उसके अलौकिक कार्याें की कथाएं मन लगाकर सुनता था। फिर मां ने उसे बताया कि हनुमान अमर हैं और अब भी जीवित हैं। तब से वह उसे देखने के लिए बड़ा उत्सुक था। पर देखे तो कहां देखे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एक दिन वह कथा सुनने गया तो कथाकार पंडित अपनी अलंकारिक भाषा में हास्य-रस मिलाकर हनुमान के चरित्र का वर्णन कह रहा था। नरेन्द्र के मन में जाने क्या आई, वह धीरे-धीरे कथाकार के पास गया और पूछा, ‘‘पंडित जी, आपने जो कहा है कि हनुमान केला खाना पसंद करते हैं और केले के बगीचे में रहते हैं, तो क्या मैं वहां उनके दर्शन कर सकता हूं?’’ पंडित ने भोले बालक को बहलाने के लिए उत्तर दिया, ‘‘हां बेटा, बगीचे में तुम उन्हें पा सकते हो।’’
नरेन्द्र को विचारकों तथा वैज्ञानिकों की समृद्व परम्परा विरासत में मिली थी। उसके परदादा राममोहन दत्त कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के नामी वकील थे। जहां धन-ऐश्वर्य और ख्याति प्राप्त थी, वहां ज्ञान-चर्चा और शास्त्र-चर्चा भी इस परिवार की विशेषता थी। समय के साथ-साथ चलते हुए अर्थ और मोक्ष, भोग और त्याग तथा आधुनिकता और प्राचीनता दत्त परिवार के स्वभाव तथा चरित्र में घुल-मिल गई थी। राममोहन के इकलौते बेटे दुर्गाचरण ने समय की प्रथा के अनुसार जहां संस्कृत और फारसी पढ़ी थी, वहां कामचलाऊ