था, वैसा ही बना रहा। उसमें कोई परिवर्तन तो हुआ नहीं। एकाएक विश्वनाथ बाबू उधर आ निकले और बेटे को इस स्थिति में देख उन्होंने पूछा, ‘‘अरे, यह क्या कर रहा है, बिले?’’ बेटे ने चट उत्तर दिया, ‘‘मैं यह परीक्षा कर रहा था कि अगर मैं जाति-भेद न मानूं तो मेरा क्या होगा।’’ बाप ने सस्नेह बेटे की ओर देखा और वह मुस्कराते हुए पठन कक्ष में चले गए।

लगातार रामायण और महाभारत सुनते-सुनते नरेन्द्र को उनका बहुत-सा भाग

18 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

कंठस्थ हो गया था। कथा के समय वह कई बार इन्हें अपने बल मधुर स्वर में श्रोताओं को सुनाता तो बहुत ही भला लगता। उसने भिक्षुक-गायकों से राधाकृष्ण और सीताराम की लीला संबंधी कितने ही गाने सीख लिए थे। जब वह इन्हें अपने मधुर स्वर में गाता तो सुननेवाले मुग्ध हो उठते। उसे सभी का लाड़-प्यार प्राप्त था। उसपर किसी तरह


31 of 675

ही वर्णों को संन्यासी होने और वेद के अध्ययन का समान अधिकार है, ये बातें मैंने यों ही प्रसंगवश कह दी। वे जो मुझे शुद्र कहते हैं, इसकी मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं । मेरे पूर्वजों ने गरीबों पर जो अत्याचार किया था, इससे उसका कुुछ परिशोध हो जाएगा। यदि मैं पैरिया (नीच चाण्डाल) होता, तो मुझे और भी आनन्द आता, क्योंकि मैं उन महापुरूष का शिष्य हूं, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण होते हुए भी एक पैरिया (चाण्डाल) के घर को साफ करने की अपनी इच्छा प्रकट की थी....’’(विवेकानन्द साहित्य, पंचम खंड, पृष्ठ 106)


31 of 1117