था। पर परिवार के दूसरे लोगों इस पर बड़ी आपत्िा थी। वे नरेन्द्र को तरह-तरह के भय दिखाकर दूसरी जाति के हाथ का खाने से मना करते थे।
पर यह बात नरेन्द्र के मन में न बैठती। जाति-भेद उसके लिए एक पहेली बन गया। वह सोचता-एक व्यक्ति किसी दूसरे के हाथ का क्यों नहीं खाता? अगर कोई दूसरी जात-बिरादरी के हाथ का खा ले, तो उसका क्या होगा? क्या उसके सिर पर छत टूट पड़ेगी? क्या वह मर जाएगा?
अनेक जातियों के मुवक्किल मकदमों के सिलसिले में ‘दत्त भवन’ आते रहते थे। रिवाज के अनुसार बैठक-घर के एक कोने में उनके लिए चांदी-जड़ाऊ अलग-अलग हुक्के रखे रहते थे। एक दिन उक्त विचार मन में लिए नरेन्द्र बैठक-घर में गया। वहां कोई दूसरा नहीं था। नरेन्द्र ने एक-एक हुक्के को अपने होंठों से लगाकर गुड़गुड़ाया। यह देख उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि वह जैसा पहले
14 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
सभ्यता का क्या शेष रहेगा? अकेले बंगाल ही में मेरी जाति में सबसे बड़े दार्शनिक, सबसे बड़े कवि, सबसे बड़े इतिहासज्ञ, सबसे बड़े पुरातत्वेत्ता और सबसे बड़े धर्म-प्रचारक उत्पन्न हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय में सबसे बड़े वैज्ञानिकों से भारतवर्ष को विभूषित किया है। इन निन्दकों को थोड़ा अपने देश के इतिहास का तो ज्ञान प्राप्त करना था; ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनांे वर्णों के संबंध में ज़रा अध्ययन तो करना था, ज़रा यह तो जानना था कि तीनों