का निरन्तर विकास हो रहा है, यह विकास तब तक होता रहेगा जब तक वह अपनी चरम सीमा को नहीं पहुंच जाता। और हेगल की दृष्टि में जर्मन की तत्कालीन प्रूश्यिन सरकार विकास की चरम सीमा थी, इसलिए उसके आगे विकसित होने अथवा बदलने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।

हेगल ने चूंकि सामती, पू्रश्यिन सरकार को विकास की चरम सीमा कहा था, इसलिए जर्मन वामपंथियों ने उन्हें सरकारी चिंतक बताया और उनके समूचे दर्शन

को रद्द कर दिया। लेकिन माक्र्स ने इस भूल को सुधारा माक्र्स ने कहा कि छिलके के साथ गूदा मत फेंको। हेगल का दर्शन सिर के बल खड़ा है, उसे टांगों के बल खड़ा करने की जरूरत है। मतलब यह कि समाज विचार का प्रतिबिम्ब नहीं, बल्कि विचार समाज का प्रतिबिम्ब है। जैसे-जैसे मनुष्य ने प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में आर्थिक और भौतिक उन्नति की है, वैसे-वैसे समाज और उसकी


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की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपने दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए। उसे मैं ‘जो लिख रहा हूं’ स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित करना चाहता हूं।’’

अतएव मैंने निम्नलिखित व्याख्या लिख भेजी, जो इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर है और इससे यह पुस्तक लिखने का उद्देश्य भी स्पष्ट हो जाता है। विवेकानन्द के बारे में मेरी यह धारणा है कि हमारे इस महान देश की धरती पर उनके बाद प्रथम कोटि का विचारक पैदा नहीं हुआ। विवेकानन्द ने हमारे देश में लगभग वही भूमिका अदा की है, जो जर्मनी में हेगल ने।


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