सुनते ही नरेन्द्र दौड़ा जाता और उसकी गोद में बैठकर पंजाब और अफगानिस्तान के हाथियों और ऊंटों की कहानियां बड़े चाव से सुनता। कई बार वह उसके साथ जाने का अनुरोध करता था। वह मुसलमान सज्जन हंसते हुए कहता, ‘‘तुम दो अंगुल और बड़े हो जाओ, तब मैं तुम्हें अपने साथ ज़रूर ले जाऊंगा।’’ नरेन्द्र कभी-कभी अगले ही दिन पंजों के बल खड़ा होकर कहता, ‘‘देखिए, मैं रता भर में दो अंगुली बड़ा हो गया हूं। अब आप मुझे अपने साथ ले चलिए।’’ मैं रात भर में दो अंगुली बड़ा हो गया हूं। अब आप मुझे अपने साथ ले चलिए।’’ इस पठान मुवक्किल से नरेन्द्र का अनुराग इतना बढ़ गया कि वह उसके हाथ से संदेश या फल लेकर निस्संकोच खा लेता था। विश्वनाथ कट्टर नहीं थे, उनकी दृष्टि में सभी जाति के लोग समान थे। इसलिए उनके नजदीक नरेन्द्र का मुसलमान के हाथ से खाना कोई अपराध नहीं
और मुझसे पूछा गया था कि एक शुद्र को संन्यासी होने का क्या अधिकार है? तो इस पर मेरा उत्तर यह है कि मैं उन महापुरूष का वंशधर हूं, जिनके चरण्कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है, और जिनके वंशज विशुद्व क्षत्रिय है। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो, तो इन समाज-सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने ज़माने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त, कई शताब्दियों तक आधे भारत का शासन किया था। यदि मेरी जाति छोड़ दी जाए, तो भारत की वर्तमान