था। बड़ी बहनें उसके पीछे दौड़ती कि पकड़कर पीटें। नरेन्द्र चट से नाली में उतरकर बदन पर कीचड़ लगा लेता। बहनें अपवित्र होने के डर से उसे छू न पाती। वह विजय-गर्व

17 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

से ताली बजाकर कहता, ‘‘लो, पकड़ो न मुझे!’’

घर में जाने कब से चले आ रहे देशाचर और लोकाचार के नियमों को नरेन्द्र बचपन ही से नहीं मानता था। इसके लिए मां अगर झुंझलाती या डांटती-डपटती, तो वह निरीह भाव से पूछता-भात की थाली छूकर बदन पर हाथ लगाने से क्या होता है? बायें हाथ से गिलास उठाकर जल पीने से हाथ क्यों धोना पड़ता है? हाथ में तो जूठन नहीं लगती? मां इन प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर न दे पाती तो नरेन्द्र उद्दंड हो उठता और नियमांे का उल्लंघन करता।

विश्वनाथ के मुवक्किलों में एक पठान भी था। नरेन्द्र के प्रति उसका विशेष स्नेह था। उके अपने की खबर


28 of 675



कलकत्ता में कायस्थ वंश के कई दत्त परिवार थे। इन परिवारों में बहुत से योग्य और विद्वान व्यक्ति पैदा हुए। विवेकानन्द के समकालीन इतिहासकार रमेशचंद्र दत्त उनमें से एक थे। विवेकानन्द का जन्म इसी कायस्थ परिवार में हुआ था। पर रोमां रोलां ने उन्हें क्षत्रीय वंश में उत्पन्न होना बताया है। शायद उन्हें यह भ्रान्ति इसलिए हुई कि खुद विवेकानन्द ने विदेश-यात्रा से लौटकर अपने मद्रास के भाषण में प्रसंगवश कहा थाः

एक बात और। मैंने समाज-सुधारकों के मुख-पत्र में पढ़ा कि मैं शुद्र हूं,


28 of 1117