ही उसका उत्तर दिया करता था। एक दिन अचानक ब्याह पर चर्चा चली। कोचवान को जाने क्यों ब्याह पसन्द नहीं था। उसने ब्याह का ऐसा भयानक चित्र खींचा कि नरेन्द्र बेचैन हो उठा और रोता हुआ मां के पास आया। मां ने बेटे से रोने का कारण पूछा तो उसने कोचवान की बात सुनाकर कहा, ‘‘मां, मैं सीताराम की पूजा कैसे करूं? सीता तो राम की पत्नी थी।’’ मां ने उसे गोद में बैठाकर आंसु पोंछे और बड़े दुलार से कहा, ‘‘सीताराम की पूजा न भी करो तो कोई हानि नहीं। कल से शिव की पूजा करना, बेटा!’’
मां जब किसी काम में व्यस्त हो गई तो नरेन्द्र दबे पांव ऊपर गया। सीताराम की मूर्ति, जो उसने इतने चाव और श्रद्वा से खरीदी थी, कमरे से उठा लाया। मुंडेर पर आकर उसने मूर्ति बिना संकोच नीचे फेंक दी, जो गिरते ही चूर-चूर हो गई।
नरेन्द्र बड़ा नटखट था। उसके ऊधम के मारे सबकी नाक में दम
पहले उनके दो लड़कियां थी। बेटे का मुंह देखने की उनके मन में बड़ी अभिलाषा थी, इसलिए सुबह-शाम शिव-मंदिर जाकर प्रार्थना करने लगी। कहते हैं कि एक दिन वह पुत्र-कामना में इतनी ध्यान मग्न हुई कि उन्हें कैलाशपति शिव सामने खड़े दिखाई दिए। धीरे-धीरे उन्होंने शिशु-रूप धारण किया और भुवनेश्वरी देवी की गोद में बैठ गए। इससे मां का यह विश्वास बना कि बेटे का जन्म शिव के वरदान से हुआ है, इसलिए उन्होंने उसका नाम वीरेश्वर रखा। घर में यही नाम चलता था और प्रियजन ‘बिले’ कहकर पुकारते थे।