और महाभारत की कथा होती थी। कोई बुढ़िया अथवा खुद भुवनेश्वरी देवी पढ़ती और मुहल्ले की दूसरी औरतें सुनती। नरेन्द्र वैसे चंचल स्वभाव का बालक था, लेकिन इस छोटी-सी महिला सभा में वह चुपचाप और शान्त बैठा रहता था। इन ग्रन्थों की कहानियांे का उसके मन पर गम्भीर प्रभाव पड़ता, इनके पात्र उसकी कल्पना में सजीव हो उठते और वह घंटों मंत्रमुग्ध-सा बैठा सुना करता।

रामायण सुनते-सुनते नरेन्द्र को सीता और राम से इतनी श्रद्वा हो गई कि वह एक दिन बाज़ार से उन दोनों की मूर्ति खरीद लाया। मकान की छत पर एक सूने कमरे में उसने यह मूर्ति स्थापित कर दी और वह उसके सामने घंटों ध्यान-मग्न बैठा रहता। अपने एक कोचबान से नरेन्द्र बहत हिल-मिल गया था। बालक को सीताराम से यह प्रेम देखकर वह कोचवान बहुत प्रसन्न होता। नरेन्द्र के मन में कोई समस्या, कोई प्रश्न उठता तो कोचवान मित्र


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‘‘छोटी अवस्था ही से मैं बड़ा साहसी था। यदि ऐसा न होता तो खाली हाथ सारी दुनिया घूम आना क्या मेरे लिए कभी संभव होता!’’

विवेकानन्द

12 जनवरी, 1863, प्रभात का समय। स्त्री-पुरूषों के दल के दल मकर सम्तमी के स्नान के लिए गंगा की ओर जा रहे थे। इसी समय कलकत्ता के गण्यमान्य दत्त परिवार में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम नरेन्द्रनाथ रखा गया। आगे चलकर यही नरेन्द्रनाथ विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्व हुआ। बालक की मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। नरेन्द्र से


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