16 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
गाड़ी-घोड़े रखकर ठाठ-बाट से जीना, उनका स्वभाव बन चुका था। वे खुले हाथ से खर्च करते और खुले हाथ से दान भी देते थे। बचाकर रखने की, भविष्य अथवा परलोक की चिंता उन्हें नहीं थी। एक वाक्य में यों कह लीजिए कि वे भोग और त्याग का ‘आधुनिक समिश्रण’ थे-उदार, स्वच्छंद और मिलनसार!
ठसके विपरीत भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थी। नरेन्द्र के बाद दो छोटे भाई और दो बहनें और थी। मां बेटे-बेटियों की स्नेह-पूर्वक देख-भाल करती थी। रामायण, महाभारत, भागवत आदि पुराणों का पाठ वे नियमित रूप से किया करती थी। और पति तथा पुत्रों से चर्चा चलाकर तत्कालीन हलचलों और आधुनिक विचारधारा से भी अवगत रहती थी। नरेन्द्र को मां के मुख से रामायण और महाभारत की कहानियां बड़े चाव से सुनाया करती थी। दत्त भवन में प्रायः प्रतिदिन दोपहर को रामायण
किया है। विवेकानन्द कोई साधारण विचारक नहीं थे, वह अपने समय का चलता-फिरता ज्ञान-कोश थे। उन्होंने न सिर्फ अपने देश का बल्कि दुनिया-भर का इतिहास और दर्शन खंगाल डाला था। उन्हें पढ़ते समय लगता है कि उन्हें समझे बिना हमारे देश में सही माक्र्सवादी बनना संभव नहीं है।
अतएव मेरा यह विश्वास है कि विवेकानन्द पर मेरी यह पुस्तक हमारे देश के वामपंथी चिंतन में ऐतिहासिक मोड़ की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
हंसराज रहबर
एस.16, शाहदरा
दिल्ली
पुरखे और बचपन