नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ इस तीसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। धार्मिक कट्टरता का उनमें लेशमात्र न था। अंगे्रजी साहित्य और इतिहास आदि के अध्ययन के अलावा उन्होंने फारसी सीखी थी। हाफिज़ की कविताएं उन्हें विशेष रूप से पसन्द थी। ऊंचे खानदानों के कई मुसलमान मुवक्किल थे। और फिर लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली, लाहौर इत्यादि शहरों की यात्रा के कारण वे अनेक शरीफ मुसलमान परिवारों के घनिष्ठ सम्पर्क में आ चुके थे। यों वे मुसलमानों के रीति-रिवाजों से भली-भांति परिचित थे और उनका सम्मान करते थे। बाइबिल पढ़कर उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली थी। लेकिन इस जानकारी का तात्पर्य सिर्फ इतना ही था कि वह उन्हें एक व्यवहारकुशल तथा सफल वकील बनाने में उपयोगी सिद्व हुई। उन्होंने जिस आदर्श का आजीवन पालन किया, वह धड़ल्ले से कमाना और अधिकाधिक सुख-सुविधांए जुटाना। घर पर अतिथियों तथा सगे-संबंधियों की भीड़ लगी रहती थी। ज़रूरत से ज्यादा नौकर-चाकर और


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अध्यात्मवाद को। उन्होंने उल्टे-सीधे दो-चार वाक्य रटकर अपना सरलीकरण कर लिया है। वे और कुछ जानने की ज़रूरत ही महसुस नहीं करते। करें भी क्यों, जानने के लिए जानमारी करनी पड़ती है। चूहे की तरह हल्दी की एक गांठ लेकर पंसारी बन बैठना बहुत आसान है। हमारे इन दोस्तांे की भी यही हालत है। वे अपने दो-चार रटे-रटाए वाक्यों ही को देश की सारी समस्याओं का हल बता रहे हैं।

विवेकानन्द ने ज्ञानकांड को कर्मकांड से अलग करके उसकी तात्िवक मीमांसा की है और उसे विकसित


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