हो गया था। इन दोनों के आपसी संघर्ष का परिणाम यह था कि आदि ब्रह्मसमाज वाले प्राचीनता के खोल में सिकुड़ते जा रहे थे और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज वाले परम्परा से संबंध-विच्छेद करके आधुनिकता के नशे में लड़खड़ाते पाश्चात्य की ओर झुक रहे थे। पढ़े-लिखे बंगाली युवक अपने स्वभाव और संस्कार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक को चुनते थे। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी दिन-दिन बढ़ती जा रही थी, जिनका न आदि ब्रह्मसमाज से कोई सरोकार था और न अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज से। और अगर था तो वह भी अत्यन्त औपचारिक और ऊपरी । उन्हें न प्राचीनता से कुछ लेना-देना था और न अपने को आधुनिक दिखाने की विशेष चिन्ता थी। व्यक्तिगत सुख-साधन उनके जीवन का एकमात्र आधार और शिक्षा तथा ज्ञान-चर्चा धन और यश अर्जित करने का साधन मात्र थे। वे अतीत और भविष्य की सरदर्दी मोल न लेकर निश्चित भाव से क्षण में जीते थे।
तथाकथित माक्र्सवादी यह नहीं समझ पाए कि धर्म के कर्मकांड और ज्ञानकांड-दो पक्ष हैं; आदर्शवादी विचारधारा और भौतिकवादी विचारधारा एक ही सिक्के के दो पहलू है। जब तक आदर्शवादी विचारधारा और उसके विकास प्रक्रिया को भी भली-भांति समझ न लेना सम्भव नहीं है। सिर्फ माक्र्सवाद-लेनिनवाद और माओ त्से तुंग विचारधारा पढ़ लेने से जो एकपक्षीय समझ बनती है, उससे आदमी कठमुल्ला और रूढ़िवादी बन जाता है।
त्रासदी यह है कि हमारे ये तथाकथित वामपक्षी न माक्र्सवाद को समझते हैं
और न