अब मैकाॅले की शिक्षा प्रणाली ने ले लिया था। संस्कृत तथा फारसी की शिक्षा गौण हो गई थी और अंगे्रजी का बोलबाला था। राजामोहन राय क्या चाहते थे और मैकाॅलेक की शिक्षा प्रणाली ने हमें क्या दिया, इस पर हम आगे चलकर ‘पुनर्जागरण’ परिच्छेद में विचार करेंगे।। यहां सिर्फ
इतना कह देना काफी है कि राजा राममोहन राय प्राचीनता और आधुनिकता में समन्वय और सांमजस्य की जिस स्वस्थ भावना को लेकर चले थे, वह उपेक्षित और विकृत होती जा रही थी। धर्मांधता और रूढ़िवाद के स्थान पर भूगोल, इतिहास, साहित्य, गणित तथा विज्ञान की शिक्षा संकीर्णता तथा छिछले विद्याअभिमान को जन्म दे रही थी। चिंतन के क्षितिज पर यह भय स्पष्ट मंडरा रहा था कि कहीं प्राच्य पाश्चात्य से पराजित न हो जाए। ब्रह्मसमाज, जो वास्तव में इस संघर्ष का संगठित रूप था, अब इस भय के कारण आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज-दो में विभाजित
कि धार्मिक विचारधारा जब विभिन्न संस्थाओं का भौतिक रूप धारण कर लेती है तो संस्कृति और परम्परा इन संस्थाओं और भौतिक उन्नति रूक जाए तो इन संस्थाओं और धार्मिक मान्यताओं पर सीधा प्रहार करने से कोई लाभ नहीं। जब भौतिक और आर्थिक परिवर्तन आएगा, तभी इन संस्थाओं को तभी छोड़ेंगे जब उन्हें यह विश्वास हो आएगा कि हम जो नई वैज्ञानिक मान्यताएं उन्हें दे रहे हैं, उनकी पहली मान्यताओं से बेहतर हैं और उनकी सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाने और समृद्व करने वाली हैं, अन्यथा नहीं।
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