की विशेषता थी। समय के साथ-साथ चलते हुए अर्थ और मोक्ष, भोग और त्याग तथा आधुनिकता और प्राचीनता दत्त परिवार के स्वभाव तथा चरित्र में घुल-मिल गई थी। राममोहन के इकलौते बेटे दुर्गाचरण ने समय की प्रथा के अनुसार जहां संस्कृत और फारसी पढ़ी थी, वहां कामचलाऊ अंग्रेजी भी सीखी थी और वे छोटी ही उम्र में वकालत के धंधे में पड़ गए थे। पर उनका स्वभाव पिता से भिन्न था, धन कमाने में उनकी अधिक रूचि नहीं थी। धर्मानुरागी युवक दुर्गाचरण सत्संग और शास्त्र-चर्चा के अवसर और सुयोग खोजते रहते थे। परिणाम यह कि जब उनकी अवस्था सिर्फ पच्चीस बरस थी तो उत्तर-पश्चिम प्रदेशों से आए वेदान्ती साधुओं से वे इतने प्रभावित हुए कि घर-बार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। पतिवियोग में तड़पती हुई जवान पत्नी के लिए गोद का नन्हा बालक ही एकमात्र सहारा रह गया। संन्यासी प्रथा के अनुसार बारह बरस


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मार्ग छोड़ देने वाले क्रांतिकारी तत्वों ने तीसरी कम्युनिष्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) बनाई। और मैंने स्वभावतः उनका साथ दिया। लेकिन जब कलकत्ता में विवेकानन्द और विद्यासागर इत्यादि की मूर्तियां तोड़ी गई तो मैंने महसूस किया कि क्रांतिकारी तत्वों में भी विरासत में मिली गलत प्रवृत्िायां मौजुद हैं तो ऐतिहासिक परम्परा से जुड़ने के बाद संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया ही में दूर होंगी।

विवेकानन्द बीसवीं सदी के अंत तक हमारे चिंतन को विकसित करके जहां पहुंचा गए है। उससे सूत्र जोड़कर ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और


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