जिन्होंने मुझे लिखा-‘‘आपके मन में विवेकानन्द पर लिखने का विचार कैसे आया जबकि आप कम्युनिष्ट धर्म, और विश्लेषण हिन्दू धर्म, को प्रतिक्रियावादी मानते हैं? आप विवेकानन्द की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपने दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए। उसे मैं ‘जो लिख रहा हूं’ स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित करना चाहता हूं।’’

अतएव मैंने निम्नलिखित व्याख्या लिख भेजी, जो इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर है और इससे यह पुस्तक लिखने का उद्देश्य भी स्पष्ट हो जाता है। विवेकानन्द के बारे में मेरी यह धारणा है कि हमारे इस महान देश की धरती पर उनके बाद प्रथम कोटि का विचारक पैदा नहीं हुआ। विवेकानन्द ने हमारे देश में लगभग वही भूमिका अदा की है, जो जर्मनी में हेगल ने। हेगल ने जर्मन आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक सिद्वांत द्वारा भौतिकवाद के कगार तक पहुंचा दिया था। हेगल की मान्यता थी कि समाज विचार का प्रतिबिम्ब मात्र है और चूंकि विचार


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से मेरा विरोध करते हैं और जो यह भ्रांति फेलाते है कि मेरे विश्लेषण एक-पक्षीय होते हैं, हालांकि वे मेरी उक्त पुस्तकों में ऐसा एक भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पाए। दूसरा निरीह स्वर उन सहृय मित्रों तथा पाठकों का था जो विवेकानन्द के बारे में मेरा मत जानना चाहते थे। इन्हीं में एक लघु पत्रिका के सम्पादक धर्मेन्द्र गुप्त भी थे, जिन्होंने मुझे लिखा-‘‘आपके मन में विवेकानन्द पर लिखने का विचार कैसे आया जबकि आप कम्युनिष्ट धर्म, और विश्लेषण हिन्दू धर्म, को प्रतिक्रियावादी मानते हैं? आप विवेकानन्द


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