इन तीनांे वर्णों के संबंध में ज़रा अध्ययन तो करना था, ज़रा यह तो जानना था कि तीनों ही वर्णों को संन्यासी होने और वेद के अध्ययन का समान अधिकार है, ये बातें मैंने यों ही प्रसंगवश कह दी। वे जो मुझे शुद्र कहते हैं, इसकी मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं । मेरे पूर्वजों ने गरीबों पर जो अत्याचार किया था, इससे उसका कुुछ परिशोध हो जाएगा। यदि मैं पैरिया (नीच चाण्डाल) होता, तो मुझे और भी आनन्द आता, क्योंकि मैं उन महापुरूष का शिष्य हूं, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण होते हुए भी एक पैरिया (चाण्डाल) के घर को साफ करने की अपनी इच्छा प्रकट की थी....’’(विवेकानन्द साहित्य, पंचम खंड, पृष्ठ 106)

नरेन्द्र को विचारकों तथा वैज्ञानिकों की समृद्व परम्परा विरासत में मिली थी। उसके परदादा राममोहन दत्त कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के नामी वकील थे। जहां धन-ऐश्वर्य और ख्याति प्राप्त थी, वहां ज्ञान-चर्चा और शास्त्र-चर्चा भी इस परिवार


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है कि जब हमारे देश के अधिकांश माक्र्सवादी विवेकानन्द की अवहेलना करते हैं और हिंदू धर्म को घोर प्रतिक्रियावादी धर्म बताते हैं, मेरी यह समझ कैसे बनी?

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के नियम के अनुसार साहित्य, दर्शन तथा

राजनीतिक-किसी भी क्षेत्र में सही समझ गलत समझ के साथ संघर्ष में विकसित होती है। प्रगतिशील साहित्यक आंदोलन और कम्युनिष्ट पार्टी में मैंने प्रवृत्िायों के विरूद्व जो संघर्ष किया उसी के परिणाम-स्वरूप मेरी यह समझ बनी है। संझर्ष औरों ने भी किया और इसी के परिणामस्वरूप संसदीय


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