महापुरूष का वंशधर हूं, जिनके चरण्कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है, और जिनके वंशज विशुद्व क्षत्रिय है। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो, तो इन समाज-सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने ज़माने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त, कई शताब्दियों तक आधे भारत का शासन किया था। यदि मेरी जाति छोड़ दी जाए, तो भारत की वर्तमान
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सभ्यता का क्या शेष रहेगा? अकेले बंगाल ही में मेरी जाति में सबसे बड़े दार्शनिक, सबसे बड़े कवि, सबसे बड़े इतिहासज्ञ, सबसे बड़े पुरातत्वेत्ता और सबसे बड़े धर्म-प्रचारक उत्पन्न हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय में सबसे बड़े वैज्ञानिकों से भारतवर्ष को विभूषित किया है। इन निन्दकों को थोड़ा अपने देश के इतिहास का तो ज्ञान प्राप्त करना था; ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य
इसे अलग फेंक देने के बजाए चाहिए यह कि ‘आध्यात्मिक’ शब्द हटाकर कपिल के अद्वैतवाद को ‘भौतिक’ शब्द जोड़कर मेहनतकश वर्ग के संघर्ष का शस्त्र ‘भौतिक अद्वैतवाद को बनाया जाए, जो द्वन्दात्मक भौतिकवाद ही का दूसरा नाम है। चूंकि यह अपने ही दार्शनिक विचार की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया है, इसलिए परम्परा से जुड़ी हुई जनता इसे सहज में ग्रहण कर लेगी और क्रांतिकारी भौतिक शक्ति में बदल सकेगी।
यही सब सोचकर मैंने ‘योद्धा सन्यासी विवेकानन्द’ पुस्तक लिखना शुरू की। अब सवाल यह