देवी की गोद में बैठ गए। इससे मां का यह विश्वास बना कि बेटे का जन्म शिव के वरदान से हुआ है, इसलिए उन्होंने उसका नाम वीरेश्वर रखा। घर में यही नाम चलता था और प्रियजन ‘बिले’ कहकर पुकारते थे।
कलकत्ता में कायस्थ वंश के कई दत्त परिवार थे। इन परिवारों में बहुत से योग्य और विद्वान व्यक्ति पैदा हुए। विवेकानन्द के समकालीन इतिहासकार रमेशचंद्र दत्त उनमें से एक थे। विवेकानन्द का जन्म इसी कायस्थ परिवार में हुआ था। पर रोमां रोलां ने उन्हें क्षत्रीय वंश में उत्पन्न होना बताया है। शायद उन्हें यह भ्रान्ति इसलिए हुई कि खुद विवेकानन्द ने विदेश-यात्रा से लौटकर अपने मद्रास के भाषण में प्रसंगवश कहा थाः
एक बात और। मैंने समाज-सुधारकों के मुख-पत्र में पढ़ा कि मैं शुद्र हूं, और मुझसे पूछा गया था कि एक शुद्र को संन्यासी होने का क्या अधिकार है? तो इस पर मेरा उत्तर यह है कि मैं उन
यह कि विवेकानन्द को स्वामी या धार्मिक कहकर उनकी अवहेलना करना, छिलके के साथ गूदे को-अपनी राष्ट्रीय परम्परा को अलग फेंक देने की भूल करना है, और वह हमने की।
अब यहां अपने राष्ट्रीय बुर्जवा और उनके सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता विवेकानन्द के अंतर्विरोधों पर बहस करने की गुंजाइश नहीं। इतना ही कह देना काफी होगा कि बुर्जवा ने अपने वर्ग स्वभाव ही से कपिल के ‘अद्वैतवाद’ के साथ ‘आध्यात्मिक’ जोड़कर उसे ‘आध्यात्मिक अद्वैतवाद’ बनाया और अपने राजनीतिक शस्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया।