पुरखे और बचपन

‘‘छोटी अवस्था ही से मैं बड़ा साहसी था। यदि ऐसा न होता तो खाली हाथ सारी दुनिया घूम आना क्या मेरे लिए कभी संभव होता!’’

विवेकानन्द

12 जनवरी, 1863, प्रभात का समय। स्त्री-पुरूषों के दल के दल मकर सम्तमी के स्नान के लिए गंगा की ओर जा रहे थे। इसी समय कलकत्ता के गण्यमान्य दत्त परिवार में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम नरेन्द्रनाथ रखा गया। आगे चलकर यही नरेन्द्रनाथ विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्व हुआ। बालक की मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। नरेन्द्र से पहले उनके दो लड़कियां थी। बेटे का मुंह देखने की उनके मन में बड़ी अभिलाषा थी, इसलिए सुबह-शाम शिव-मंदिर जाकर प्रार्थना करने लगी। कहते हैं कि एक दिन वह पुत्र-कामना में इतनी ध्यान मग्न हुई कि उन्हें कैलाशपति शिव सामने खड़े दिखाई दिए। धीरे-धीरे उन्होंने शिशु-रूप धारण किया और भुवनेश्वरी


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रूप धारण किया। इसमें राष्ट्रीय एकता का जो प्रदर्शन हुआ उसके कारण स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वराज का चारसूत्री कार्यक्रम निर्धारित हुआ।

इसके अलावा 1908 से क्रांति के जो गुप्त संगठन बने उनकी मुख्य प्रेरणा भी विवेकानन्द की शिक्षाएं थी। पुलिस ने जिन क्रांतिकारी नौजवानों के घरों की तलाशियां ली उनमें विवेकानन्द साहित्य ज़रूर मिला। इकबाल का कौमी तराना-‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ (1905 और) ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ इसी आध्यात्मिक विजय से प्रेरित होकर लिखे गए। सारांश


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