क्यों, जानने के लिए जानमारी करनी पड़ती है। चूहे की तरह हल्दी की एक गांठ लेकर पंसारी बन बैठना बहुत आसान है। हमारे इन दोस्तांे की भी यही हालत है। वे अपने दो-चार रटे-रटाए वाक्यों ही को देश की सारी समस्याओं का हल बता रहे हैं।

विवेकानन्द ने ज्ञानकांड को कर्मकांड से अलग करके उसकी तात्िवक मीमांसा की है और उसे विकसित किया है। विवेकानन्द कोई साधारण विचारक नहीं थे, वह अपने समय का चलता-फिरता ज्ञान-कोश थे। उन्होंने न सिर्फ अपने देश का बल्कि दुनिया-भर का इतिहास और दर्शन खंगाल डाला था। उन्हें पढ़ते समय लगता है कि उन्हें समझे बिना हमारे देश में सही माक्र्सवादी बनना संभव नहीं है।

अतएव मेरा यह विश्वास है कि विवेकानन्द पर मेरी यह पुस्तक हमारे देश के वामपंथी चिंतन में ऐतिहासिक मोड़ की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।

हंसराज रहबर

एस.16, शाहदरा

दिल्ली


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भौगोलिक सीमाएं मिट जाएंगी। आध्यामिक अद्वैतवाद के आधार पर एक विश्व धर्म और विश्वबंधुत्व का स्वप्न साकार होगा।

विवेकानन्द ने स्वदेश लौटकर अपने कलकत्ता के भाषण में इसी आध्यात्मिक अद्वैतवाद के आधार पर विश्व की आध्यात्मिक विजय को भारत की वैदेशिक नीति का प्रारम्भ और अखंड राष्ट्रीय एकता स्थापित करना अपना प्रधान जीवनोद्देश्य बताया।

अब इतिहास इस बात का साक्षी है कि उन्नीसवीं सदी के अंत तक जो लड़ाई धर्म के क्षेत्र में लड़ी जा रही थी 1905 में उसने स्वदेशी आंदोलन का राजनीतिक


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