कि हम जो नई वैज्ञानिक मान्यताएं उन्हें दे रहे हैं, उनकी पहली मान्यताओं से बेहतर हैं और उनकी सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाने और समृद्व करने वाली हैं, अन्यथा नहीं।
ये तथाकथित माक्र्सवादी यह नहीं समझ पाए कि धर्म के कर्मकांड और ज्ञानकांड-दो पक्ष हैं; आदर्शवादी विचारधारा और भौतिकवादी विचारधारा एक ही सिक्के के दो पहलू है। जब तक आदर्शवादी विचारधारा और उसके विकास प्रक्रिया को भी भली-भांति समझ न लेना सम्भव नहीं है। सिर्फ माक्र्सवाद-लेनिनवाद और माओ त्से तुंग विचारधारा पढ़ लेने से जो एकपक्षीय समझ बनती है, उससे आदमी कठमुल्ला और रूढ़िवादी बन जाता है।
त्रासदी यह है कि हमारे ये तथाकथित वामपक्षी न माक्र्सवाद को समझते हैं
और न अध्यात्मवाद को। उन्होंने उल्टे-सीधे दो-चार वाक्य रटकर अपना सरलीकरण कर लिया है। वे और कुछ जानने की ज़रूरत ही महसुस नहीं करते। करें भी
तक पहुंच चुका था। धर्म तुम हमें क्या सिखाओगे, वो तुम जितना चाहे हमसे ले लो। भारत की जनता को तो रोटी चाहिए, कपड़ा चाहिए, सो तुम और तुम्हारी सरकारें उन्हें देने के बजाए उल्टा उनसे छीन रही है।
फिर उन्होंने अपना दावा पेश किया और वेदान्त दर्शन की तात्विक व्याख्या करते हुए बताया कि मनुष्य स्वभाव ही से पवित्र और आत्मस्वरूप है। जब प्रत्येक मनुष्य वेदान्त की चरम-उच्चतम स्थिति में पहुंचकर अपने इस आत्मस्वरूप
को पहचान लेगा तब आपस की घृणा, मतमतान्तर के झगड़े और