55 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
नहीं। ज़रा सोचिए-बारह लड़के लोगों को सुनावें भी बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्वान्त, और यह शेखी हांके कि वे इन विचारों को जीवन में चरितार्थ? साक्षात् करेंगे! हां, सभी ने हंसी की, हंसी करते-करते वे गम्भीर हो गए- हमारे पीछे पड़ गए-उत्पीड़न करने लगे। बालकों के माता-पिता हमें क्रोध से धिक्कारने लगे और ज्यों-ज्यों लोगों ने हमारी खिल्ली उड़ाई, त्यों-त्यों हम और भी दृढ़ होते गए।’’ (वि. सा., इशम खंड, पृष्ठ 10)
पारिवारिक अभाव अभी दूर नहीं हुआ था, इसलिए विवेकानन्द चाहे अधिकांश समय मठ में बिताते और गुरू-भाइयों की शिक्षा-दीक्षा तथा देखभाल पर पूरा ध्यान देते थे, पर वे रहते घर पर थे। मकान का झगड़ा अभी समाप्त नहीं हुआ था। संबंधियों ने मुकदमें की अपील कर दी थी। अपील का फेसला अभी नहीं हुआ था और इस कारण भी उनका घर पर रहना आवश्यक
किसी पर थोपते नहीं थे और अगर कोई दूसरा किसी पर थोपे तो वे उसका विरोध करते थे। अपने शिष्यों के प्रति रामकृष्ण के व्यवहार के बारे में रोमां रोलां लिखते है, ‘‘उस समय तक भारतवर्ष में गुरू का उसके शिष्य माता-पिता से भी बढ़कर आदर करते थे। परन्तु रामकृष्ण ऐसा कुछ न चाहते थे। वे अपने-आपको अपने शिष्यों के समान समझते थे। वे उनके साथी, उनके भाई थे। वे घनिष्ठ मित्र के रूप में उनसे बातें करते थे और किसी प्रकार के बड़प्पन का भाव प्रदर्शित नहीं करते थे।’’ (रामकृृष्ण, पृष्ठ 2014)