इसके बावजुद पूजा, ध्यान, जप बराबर चलता रहता था, उत्साह में भरकर कीर्तन शुरू करते तो बाहर सुनने वालों की भीड़ लग जाती।
कई बार गृहस्थ भक्त भी वराहनगर के इस मठ में आते। अपने गुरू-भाइयों के साथ रामकृष्ण के जीवन और धर्म-संबंधी चर्चा करते। लेकिन अक्सर इधर-उधर के अपरिचित व्यक्ति भी कौतुलवश मठ में चले आते। वे इन तरूण संन्यासियों से तर्क करते, उनकी परीक्षा लेते और कुछ ऐसे होते जो हंसी-ठिठोली और अशिष्ट आलोचना से भी ब़ाज न आते। इसके अलावा इन युवकों के अभिभावक इन्हें समझा-बुझाकर घर लौटा ले जाने के लिए मठ में आते। वे उन्हें गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता और उज्जवल भविष्य के सब्ज़बाग दिखाते। विवेकानन्द ने इस परिस्थिति का उल्लेख ‘मेरा जीवन और ध्येय’ भाषण में इस प्रकार किया हैः
‘‘हमारे कोई मित्र न थे। हमें सुनता भी कौन? कुछ विचित्र-सी विचारधारा को लिए हुए छोकरे जो थे न? कम से कम भारत में तो छोकरों की कोई गिनती
कि वह रामकृष्ण के पीछे-पीछे मंदिर में जाकर देवमूर्तियों को प्रणाम कर रहा है। नरेन्द्र का पारा चढ़ गया। उसने राखाल पर प्रतिज्ञा भंग करने का दोष लगाया और उसे मिथ्याचारी कहा। राखाल ने अप्रतिभ होकर गर्दन झुका ली। उससे कहते न बन पड़ा। लेकिन रामकृष्ण ने उसका पक्ष लेकर नरेन्द्र से कहा, ‘‘उसकेा यदि अब साकार में भक्ति हो, तो वह क्या करेगा? तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम न करो। पर इस प्रकार दूसरों का भाव नष्ट करने का तुम्हें क्या अधिकार है?’’
रामकृष्ण अपने विचार