विवेकानन्द थे। रामकृष्ण ने विदा होते समय अपने शिष्यों को विवेकानन्द को सौंपते हुए कहा था, ‘‘इन बच्चों की देख-भाल करना।’’
गुरू की मृत्यु के थोड़े ही दिन बाद काशीपुर का उद्यान-भवन खाली करना पड़ा। रामकृष्ण के शिष्यों में दो तरह के लोग थे-एक वे जिन्होंने संन्यास धारण किया था, उनकी संख्या बारह थी, और विवेकानन्द उनमें से एक थे। दूसरे, लगभग इतनी ही संख्या उनके गृहस्थ शिष्यों की थी। अब यह समस्या सामने आई कि तरूण संन्यासियों के रहने की व्यवस्था क्या हो। सुरेन्द्रनाथ मित्र ने एक मकान वराहनगर में किराए पर ले दिया। नीचे की मंज़िल बेकार थी। पर इन युवा संन्यासियों को जो कुछ मिल जाता था, वे उसी में संतुष्ट रहते थे। अपने अभाव की बात उन्होंने कभी सुरेन्द्र मित्र से जाकर नहीं कही। थाली, बर्तन आदि कुछ न था। उबाले हुए कुंदरव के पत्ो और भात, अरबी के पत्तों पर रखकर खाते थे।
हो गया था, नहीं तो ऐसी बातें वे कैसे लिख पाते?’’ रामकृष्ण मृदु मुस्कान होंठों पर लाकर शान्त भाव से उत्तर देते, ‘‘तू इस समय उनकी बातें न लेना चाहे तो न ले, पर ऋषि-मुनियों की निंदा क्यों करता है? तू सत्य स्वरूप भगवान को पुकारता चल, उसके बाद वे जिस रूप में तेरे सामने प्रकट होंगे, उसी पर विश्वास कर लेना।’’
राखालचन्द घोष नरेन्द्र के साथ ही ब्रह्मसमाज का सदस्य बना था। अब नरेन्द्र से कुछ दिन पहले ही वह दक्षिणेश्वर आने-जाने लगा था। एक दिन नरेन्द्र ने देखा