कई दिनों के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मेरी शिक्षा प्रायः समाप्त हो गई है। मैं दूसरों को अब और शिक्षा नहीं दे सकता, क्योंकि मुझे दीखता है कि सभी कुछ प्रभुमय है। तब मैं पूछता हूं, मैं किसे शिक्षा दूं?’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 55)
रविवार 15 अगस्त, 1886 को इस महापुरूष के जीवन का सूर्य अस्त हो गया।
अपना समस्त ज्ञान और ‘खोल’ वे अपने सुयोग्य उत्तराधिकारी विवेकानन्द को विरासत में दे गए। विवेकानन्द ने इस ज्ञान का विकास और खोल का विस्तार कहां तक किया, यह हम आगे देखेंगे। नरेन्द्र को विवेकानन्द बनाने में परमहंस ने जो भूमिका अदा की, रोमां रोलां ने उसका उल्लेख इन शब्दों मंे किया हैः
53 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘‘जो धारा विवेकानन्द की असाधारण नियति को गढ़ रही थी, वह धरती के पेट ही में समा गई होती यदि रामकृष्ण की अचूक दृष्टि ने मानो अमोघ बाण की भांति पथ-रोचक चट्टान को
हो सकता है कि दृष्टि ने धोखा खाया हो। इसी तरह जो व्यक्ति शिक्षा देने का योग्य अधिकारी न हो, उसे नरेन्द्र उसे गुरू धारण करने को तैयार नहीं था, इसलिए उसने भी रामकृष्ण के स्वभाव और शक्ति की परीक्षा लेना आवश्यक समझाा। यों कहिए कि एक अद्भुत पुरूष और एक असाधारण युवक अपने-अपने कक्षपथ में घूमने वाले नक्षत्रों की तरह सहसा एक दूसरे से आ टकराए और उन दोनों में गुरू-शिष्य का संबंध होने से पहले वे एक-दूसरे की परीक्षा लेते-एक दूसरे को समझते-परखते रहे।
नरेन्द्र