क्या चाहते हैं कि वह मैं वापस मांगू?’’ शिष्यों का उलाहना था कि रामकृष्ण स्वस्थ होना नहीं चाहते हैं।
‘‘तुम क्या समझते हो कि मैं अपनी इच्छा से कष्ट भोग रहा हूं? मैं तो अच्छा होना चाहता हूं, पर वह मां पर निर्भर है।’’ ‘‘तो मां से प्रार्थना कीजिए।’’
‘‘तुम लोगों का यह कह देना आसान है, पर मुझसे वे शब्द ही नहीं कहे जाते।’’
नरेन्द्र ने आग्रह किया, ‘‘हम पर दया करके ही आप कहिए।’’
गुरू ने मधुर भाव से कहा, ‘‘अच्छा, मुझसे जो बन पड़ेगा, प्रयत्न करूंगा।’’
शिष्यों ने उन्हें कुछ घंटे अकेले छोड़ दिया। जब वे लौटे तो गुरू ने कहा, ‘‘मैंने मां से कहा था, ‘‘मां, कष्ट के कारण मैं कुछ खा नहीं सकता। यह सम्भव कर दे कि मैं कुछ खा सकूं।’ मां ने तुम सबकी ओर संकेत करके मुझसे कहा, ‘इतने सब मुंह है तो हैं, जिनके द्वारा तू खा सकता है।’ मैं लज्जित हो गया और फिर मुझसे कुछ नहीं कहा गया।’’
गठन का असाधारण युवक था, जिसके बाहरी आचरण से लोग उसे उद्दंड, हठी, दम्भी तथा कैसे तड़प् रहा है और जीवन रहस्य पा जाने के लिए सुख-भोग तो क्या, वह प्राण तक होम कर सकता है।
रामकृष्ण किसी भी व्यक्ति को जांच-परखकर अपना शिष्य बनाया करते थे। नरेन्द्र की असाधारण प्रतिभा को चाहे उन्होंने पहचान लिया था और चाहे वे उसे तन-मन से प्यार करते थे, उसे देखे बिना चैन न पड़ता था, लेकिन शिष्य के रूप में ग्रहण करनके से पहले उसकी भी परीक्षा लेना आवश्यक था।