हुआ था और जिस कलकत्ता में जाने क्या-क्या सपने मन में संजोकर उन्होंने पढ़ना-लिखना शुरू किया था, अब सन्यासी बनकर गली-गली भिक्षा मांगी। जो अन्न मिला, उसे पकाकर उन्होंने परमहंस के सामने रखा और फिर प्रसाद ग्रहण किया। उस दिन रामकृष्ण के आनन्द का ठिकाना न था।

रामकृष्ण की तबीयत बीच में एक बार कुछ सुधरी थी, उसके बाद हालत बिगड़ती चली गई। रोमां रोलां लिखते हैं, ‘‘नरेन उनके (शिष्यों) कार्य और उनकी प्रार्थनाओं का निर्देशन करते थे। उन्होंने गुरू से भी प्रार्थना की कि उनके स्वास्थ्य-लाभ की प्रार्थना में वे भी योग दें। समान विचारों के एक पंडित के आगमन से उनके आग्रह को और भी बल मिला।

पंडित ने रामकृष्ण से कहा, ‘‘धर्मशास्त्रों का मत है कि आप जैसे सन्त अपने इच्छाबल ही से अपनी चिकित्सा कर सकते हैं।’’

रामकृष्ण बोले, ‘‘मैंने अपना मन सम्पूर्णतया भगवान को सौंप दिया है। आप


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कोई बात ही नहीं। वह ब्रह्मसमाज में भी जाता है, वहां भजन गाता है। परन्तु दूसरे ब्रह्मों की तरह नहीं-वह यथार्थ ब्रह्मज्ञानी है। ध्यान के लिए बैठते ही उसे ज्योति दर्शन होता है, उसे मैं यों ही प्यार नहीं करता।’’(रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृ. 101)

नरेन्द्र के इन्हीं गुणों के कारण रामकृष्ण अपने शिष्यों में उसे सबसे अधिक प्यार करते और उसे अपनाकर अपने युग-कार्य के लिए तैयार करना चाहते थे। लेकिन नरेन्द्र भी सहज मंे हाथ लग जाने वाला नहीं था। वह भी दृढ़ संस्कारयुक्त


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