भौतिकवाद और हमारी संस्कृति तथा परम्परा का विकास संभव है; यही सोचकर मैंने विवेकानन्द पर पुस्तक लिखना तय किया। वामपंथी छिछले छोकरों और कुछ संजीदा लोगों ने भी इसका विरोध किया। मैंने इस विरोध को भी तर्क से काट दिया। लेनिन ने कहा है, ‘कम्युनिष्ट तभी नेतृत्व की भूमिका अदा कर सकते हैं, जब वे उसकी सही व्याख्या करें, जिसे लोग पहले से जानते-पहचानते हैं।’’
दरअसल हिंदू धर्म को प्रतिक्रियावादी मान लेने की भ्रांति ही इस विरोध का कारण है। ये तथाकथित माक्र्सवादी यह नहीं समझ पाये कि धार्मिक विचारधारा जब विभिन्न संस्थाओं का भौतिक रूप धारण कर लेती है तो संस्कृति और परम्परा इन संस्थाओं और भौतिक उन्नति रूक जाए तो इन संस्थाओं और धार्मिक मान्यताओं पर सीधा प्रहार करने से कोई लाभ नहीं। जब भौतिक और आर्थिक परिवर्तन आएगा, तभी इन संस्थाओं को तभी छोड़ेंगे जब उन्हें यह विश्वास हो आएगा
विवेकानन्द ने धर्म-महासभा में आक्रमण रूख अपनाकर मिशनरियों के इस दावे को झुठलाया कि ईसाई धर्म चूंकि विजेताओं का और समृद्वि का धर्म है, इसीलिए यह सच्चा धर्म है और इसी को विश्व धर्म बनना है। विवेकानन्द ने उनके इस दावे को झुठलाते हुए कहा कि क्रमविकास के सिद्वांत के अनुसार द्वैत, विशिष्टाद्वैत, अद्वैत, एक के बाद एक, धर्म के तीन सोपान-तीन स्थितियां हैं। ईसाई धर्म तो अभी पहली ही सीढ़ी पर मंडरा रहा है और वह धर्म आज से हज़ारों साल पहले अद्वैतवाद की चरम सीमा