दिन-रात गाना-भजन चलता रहा। नरेन्द्र भावोन्मत्त होकर रामकृष्ण, सीताराम, चैतन्यदेव के लीला संबंधी गीत गाकर भक्तों को आनन्द प्रदान करता रहा। उधर रामकृष्ण काली से प्रार्थना करने लगे, ‘‘मां, उसकी अद्वैत की अनुभूति को तू अपनी माया-शक्ति के द्वारा ढक रख। मुझे तो अभी उससे अनेक काम कराने हैं।’’
जो बारह शिष्य घर-बार छोड़कर काशीपुर में रहते थे, गुरू-सेवा करते-करते उनमें प्रेम संबंध दृढ़ हो गया। एक दिन इसी उद्यान-भवन में रामकृष्ण संघ की नींव रखी गई। अपने इन तरूण शिष्यों को गेरूआ वस्त्र पहनाकर रामकृष्ण ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी और उनके नेता नरेन्द्र से कहा, ‘‘क्या तुम लोग सम्पूर्ण निराभिमान बनकर भिक्षा की झोली कन्धे पर लिये राजपथों पर भिक्षा मांग सकोगे?’’
52 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वे लोग उसी समय भिक्षा मांगने निकल पड़े। उसी कलकत्ता में जिसमें उनका जन्म
जिस तरह रामकृष्ण परमहंस को देखकर नरेन्द्र की एक राय बनी थी, उसी तरह नरेन्द्र को देखकर परमहंस की जो राय बनी, उसे उन्होंने यों व्यक्त किया हैः ‘‘मेरे नरेन्द्र के भीतर थोड़ी भी कृत्रिमता नहीं है। बजाकर देखो तो ठन-ठन शब्द होता है। दूसरे लड़कों को देखता हूं, मानो आंख-कान दबाकर किसी तरह दो-तीन परीक्षाओं को पार कर लिया है, बस वहीं तक-उतना करते ही सारी शक्ति निकल गई है। परन्तु नरेन्द्र वैसा नहीं है, हंसते-हंसते सब काम करता है, पास करना उसके लिए