नरेन्द्र की विशाल आंखों में आंसु डबडबा आंए और वह आग्रहपूर्वक बोला, ‘निर्विकल्प समाधि न होने तक मेरा मन किसी भी तरह शान्त नहीं होने का और यदि वह न हुआ तो मैं वह सब कुछ भी न कर सकूंगा।’’
‘‘तू क्या अपनी इच्छा से करेगा? जगदम्बा तेरी गर्दन पकड़कर करा लेंगी। तू न करे-तेरी हड्डियां करेंगी।’’
पर नरेन्द्र की प्रार्थना को वह टाल नहीं पाए। अन्त में बोले, ‘‘अच्छा जा, निर्विकल्प समाधि होगी।
एक दिन शाम को ध्यान करते-करते नरेन्द्र अकस्मात निर्विकल्प समाधि में डूब गया। शिष्यों ने देखा तो उन्हें लगा कि नरेन्द्र मर गया है। वे दौड़े-दौड़े रामकृष्ण के पास आए। लेकिन उनकी बात सुनकर भी रामकृष्ण शांत रहे। थोड़ी देर बाद नरेन्द्र की चेतना लौट आई। उसका मुख-मंडल आनन्द से खिला हुआ था। उसने आकर रामकृष्ण को प्रणाम किया। वे बोले, ‘‘बस, अब तालाबंद, कुंजी मां के पास रहेगी। काम समाप्त होने पर फिर खोल दिया जाएगा।’’
रामकृष्ण नरेन्द्र को अपने शिष्यों में सबसे अधिक प्यार करते थे। उन्होंने सुरेन्द्रनाथ के मकान पर पहली ही नज़र में पहचान लिया था कि नरेन्द्र एक सत्यनिष्ठ
35 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और दृढ़-चरित्र युवक है और उसमें लोकनायक बनने की बड़ी सम्भावनाएं हैं। रामकृष्ण ने अपनी अंतदृष्टि से भांप लिया कि उनके ‘जितने मत उतने पथ’ सार्वभौम संदेश का प्रचार करने के लिए नरेन्द्र एक योग्य अधिकारी है। सिर्फ इतना ही नहीं उनकी मिथक-Ûष्टा समृद्व कल्पना ने उसे ‘सप्तर्षि-मंडल में से एक नर-रूपी नारायण’ बना दिया।